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भास्कर, पत्रिका और जागरण मध्य भारत में आमने-सामने

[ Friday 25 May 2012 | 0 आपकी राय ]

अमेरिका और यूरोप में जब समाचार पत्र मर रहे हैं, तब भारत में खासकर हिंदी के समाचार पत्रों में जबरदस्त तेजी का दौर है. लेकिन यह तेजी कई तरह के तनाव भी पैदा कर रही है. समाचार पत्र समूहों को अब खेल के पुराने मैदान छोटे लग रहे हैं. वे विस्तार कर रहे हैं लेकिन ऐसा करते ही वे किसी और अखबार के क्षेत्र में घुस जाते हैं, यह लड़ाई पूरे उत्तर भारत में लड़ी जा रही है लेकिन इस बार हिंदी के अखबारों के बीच की लड़ाई का केंद्रबिंदु बना है मध्य प्रदेश.

नंबर वन की महाभारत में कूदे तीन खिलाड़ी दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिक जागरण इस बार मध्य भारत स्थित इस सूबे में अपनी धमक के साथ आमने-सामने हैं.

पाठक संख्या को बढ़ाकर विज्ञापन में ज्‍यादा हिस्सेदारी के लिए ये अखबार विलय और अधिग्रहण पर जोर दे रहे हैं. कागज पर सरकारी रियायत खत्म होने और विज्ञापन बाजार में कमजोर पड़ने की वजह से छोटे और कुछ पुराने अखबारों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है, और वे अधिग्रहण के लिए बेहतरीन सौदे बन गए हैं. जागरण और भास्कर जैसे समूह बाजार में मौजूद कुछ स्थापित समूहों का अधिग्रहण कर रहे हैं, तो राजस्थान पत्रिका अपनी क्षेत्रीय पहचान को किनारे रख अन्य राज्यों में पत्रिका के नाम से विस्तार कर रहा है.
Hindi daily
जागरण प्रकाशन लिमिटेड ने हाल ही में मध्य प्रदेश के स्थापित और नामी-गिरामी अखबार नईदुनिया का अधिग्रहण कर वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. समूह के सीईओ और संपादक संजय गुप्त इंडिया टुडे से कहते हैं, ''नईदुनिया हमारे लिए तार्किक विस्तार था क्योंकि यह मध्य भारत में हमारी जोरदार मौजूदगी में मदद करेगा. नईदुनिया की मजबूत संपादकीय टीम की जबरदस्त विश्वसनीयता है.
विलय और अधिग्रहण के माध्यम से विस्तार और विकास करने की हमारी रणनीतिक योजना के अंतर्गत यह मिड डे के बाद दूसरा अधिग्रहण है. इससे हमारा दायरा बढ़ा है और अपने वर्तमान नेटवर्क का फायदा उठाना हमारे लिए संभव हो सका है.'' देश का सबसे ज्यादा पाठकों वाला मीडिया समूह होने का दावा करते हुए गुप्त कहते हैं, ''इंडियन रीडरशिप सर्वे में समूह का एवरेज इश्यू रीडरशिप (आइआरएस) 2.6 करोड़ है और पिछले 21 बार से जागरण नंबर वन है.'' इस आंकड़े में नईदुनिया भी शामिल है.

मध्य प्रदेश परंपरागत रूप से दैनिक भास्कर का गढ़ रहा है. भास्कर की प्रतिष्ठा नए गढ़ बनाने और पुराना किला बचाए रखने की रही है. भास्कर ग्रुप के निदेशक गिरीश अग्रवाल कहते हैं, ''दैनिक भास्कर ग्रुप ईमानदारी, निष्पक्षता और उद्देश्य के साथ चलने वाला विश्वसनीय मीडिया समूह है, जो 1.91 करोड़ पाठकों की चाहत के साथ भारत के सबसे तेजी से बढ़ते 13 बाजारों में मौजूद है.'' लेकिन इन मीडिया समूहों में एक-दूसरे के बाजार में घुसकर बड़ा शेयर हथियाने की होड़ के साथ-साथ आंकड़ों की लड़ाई भी बेहद दिलचस्प है.

भास्कर ग्रुप के ब्रांड कम्युनिकेशन हेड संजीव कोटनाला औसत प्रति पाठक के आंकड़ों के आधार पर दावा करते हैं, ''हमारे समूह का एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआइआर) 1.91 करोड़ है, जबकि जागरण समूह का एआइआर 1.78 करोड़ है.'' भास्कर समूह इसमें नईदुनिया, नव दुनिया, जागरण सखी और जागरण जोश को नहीं जोड़ता है. लेकिन भास्कर ने अपने समूह के आंकड़े में डीएनए को जोड़ा है, जो एक साझा उपक्रम है. हालांकि जागरण प्रकाशन लि. के वाइस प्रेसिडेंट (स्ट्रैटजी, ब्रांड ऐंड बिजनेस डेवलपमेंट) बसंत राठौड़ जागरण समूह को भास्कर से कमतर बताने वाले दावे को तथ्यविहीन बताते हैं.

वे दावा करते हैं, ''आइआरएस के मुताबिक, हमारे समूह का एआइआर 2.6 करोड़ और कुल रीडरशिप 6.85 करोड़ है. एआइआर और कुल रीडरशिप दोनों ही आधार पर हम भारत के नंबरवन मीडिया समूह हैं'' उनके इस दावे में दैनिक जागरण, आइ नेक्सट, मिड डे (अंग्रेजी), मिड डे (गुजराती), इंकलाब, नईदुनिया, नव दुनिया, जागरण सखी और जागरण जोश शामिल है.

लेकिन इन दोनों बड़े समूहों से इतर पत्रिका ग्रुप भी हिंदी दैनिकों में नंबर दो होने का दावा करता है. पत्रिका के नेशनल हेड (मार्केटिंग) अरविंद कालिया कहते हैं, ''हिंदी दैनिकों में पत्रिका दूसरे स्थान पर है. ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) के मुताबिक, हमारा औसत सर्कुलेशन 21 लाख प्रति रोजाना है.''

दरअसल हर समूह आंकड़ों को अपनी सहूलियत के नजरिए से देखता है और आइआरएस या एबीसी के नतीजे जब भी आते हैं, अखबारों में खुद को नंबर एक बताने की होड़ मच जाती है. नईदुनिया के अधिग्रहण के बाद मध्य प्रदेश में अखबार समूहों की प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है. दैनिक भास्कर के एकाधिकार को तोड़ने के लिए मध्य प्रदेश में अपना कदम आगे बढ़ा चुके पत्रिका का दावा है कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर में वह पाठकों की बढ़त के आधार पर नंबर वन है. उसने तो इस बाबत बाकायदा इश्तहार भी निकाला.

इंदौर संस्करण में पत्रिका परिवार के वरिष्ठतम सदस्य गुलाब कोठारी लिखते हैं, ''आंकड़े कुछ भी कहते होंगे, लेकिन दिलों को जीतने में पत्रिका के आगे कोई नहीं ठहर पाएगा.'' लेकिन पत्रिका को दैनिक भास्कर चुनौती नहीं मानता है.

डी.बी. कॉर्प के कोटनाला कहते हैं, ''आइआरएस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में हमारी रीडरशिप 38 लाख है, जबकि हमारे निकटतम प्रतिद्वंद्वी अखबार की रीडरशिप महज 16 लाख है. औसत रीडरशिप के आधार पर हम राज्य के अन्य छह अखबारों के कुल योग से भी आगे हैं.'' वे दावा करते हैं, ''डी.बी. कॉर्प भारत की सबसे बड़ी प्रिंट मीडिया कंपनी है.''

आखिर मध्य प्रदेश मीडिया की होड़ का सबसे हॉट स्पॉट क्यों बना हुआ है? राज्य सीआइआइ के चेयरमैन आर.एस. गोस्वामी कहते हैं, ''पिछले 8-10 साल पहले मध्य प्रदेश बेहद पिछड़ा राज्य था. लेकिन अब तस्वीर बदली है और किसी भी राज्य की विकास दर बढ़ती है, तो प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है. यही वजह है कि राज्य में बिजनेस के जरिए अपना शेयर बढ़ाने के लिए मीडिया ग्रुप में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. वैसे भी ये सभी ग्रुप पहले से ही राज्य के बिजनेस में भी हैं और आर्थिक तरक्की ने प्रतिस्पर्धा पैदा की है.''

जाहिर है कि सभी ग्रुप विस्तारवादी नीति के जरिए सूबे के सरताज बनने की कोशिश में है. जागरण समूह ने 2007 में पहले इंदौर से अपनी शुरुआत की थी. लेकिन उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली तो अब नईदुनिया के अधिग्रहण के जरिए दैनिक जागरण ने मध्य भारत में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया हैं.

पत्रिका समूह ने 25 मई, 2008 को भोपाल से अपनी लांचिंग की. पत्रिका के नेशनल मार्केटिंग हेड अरविंद कालिया दैनिक भास्कर का नाम लिए बिना कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में पत्रिका के प्रवेश से पहले बाजार में एकाधिकार था. अब हम गर्व से कह सकते हैं कि एक अखबार विशेष का वर्चस्व खत्म हो गया है.'' पत्रिका समूह के वरिष्ठ महाप्रबंधक (सर्कुलेशन) बी.आर. सिंह कहते हैं, ''मध्य प्रदेश के बाजार में नंबर वन और दो के बीच काफी अंतर था. लेकिन आज हम भोपाल-इंदौर में सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिक बन चुके हैं.''

वैसे मीडिया में वर्चस्व की इस लड़ाई का केंद्र फिलहाल मध्य प्रदेश हो, लेकिन इसकी असली शुरुआत दिसंबर, 1996 में तब हुई थी, जब दैनिक भास्कर ने राजस्थान में पत्रिका की मांद में घुसकर उसे चुनौती दी थी. शुरुआत में तो पत्रिका ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन कीमत घटाने की जंग के बाद भास्कर ने जब चुनौती पेश की तो पत्रिका की मुश्किलें बढ़ने लगीं. कोटनाला कहते हैं, ''जयपुर में लांच के साथ पहले दिन ही हम नंबरवन हो गए.

राजस्थान में हमारी सफलता देश के प्रबंधन संस्थानों के लिए एक केस स्टडी बन गई और अपने फोकस क्षेत्र शहरी राजस्थान में हम सबसे बड़े अखबार हैं.'' पत्रिका ने भी मध्य प्रदेश में भास्कर के एकाधिकार को उसी अंदाज में चुनौती दी. इसके बाद भास्कर समूह ने जागरण समूह को ललकारना शुरू किया.

साल 2000 में भास्कर ने हरियाणा में जागरण के सामने चुनौती पेश की और इसके साथ ही पंजाब केसरी के गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अमर उजाला घुसा. इस दौर में कीमत और अखबारी मापदंड में कई बदलाव आए. इसके बाद मीडिया के इस महाभारत में एक ठहराव आया, पर भास्कर ने एक बार फिर जागरण के प्रसार वाले क्षेत्र पंजाब में धावा बोला.

पंजाब में भास्कर से मिली चुनौती के बाद जागरण ने गुरुमुखी लिपि में ही अखबार लांच कर दिया. फिर भास्कर ने प्रभात खबर और हिंदुस्तान जैसे प्रमुख अखबारों के गढ़ झारखंड में एंट्री ली और अब बिहार जैसे बड़े राज्य में जाने की तैयारी अंतिम चरण में है. दिल्ली और बिहार का प्रमुख अखबार हिंदुस्तान इन दिनों खासकर उत्तर प्रदेश में अपना लगातार विस्तार कर रहा है और नए संस्कण खोल रहा है. वहीं झारखंड के अखबार प्रभात खबर ने बिहार में कदम बढ़ाए हैं.

बाजार में हिस्सेदारी के लिए अधिग्रहण और विलय भी जारी है. भास्कर ने .जी ग्रुप के साथ साझा उपक्रम बनाकर मुंबई में अंग्रेजी अखबार डीएनए लांच किया था, तो जवाब में जागरण ने मिड डे, उर्दू अखबार इंकलाब और हाल ही में नईदुनिया का अधिग्रहण किया.

बाजार की चर्चाओं की मानें, तो जल्द ही भास्कर समूह एक और अंग्रेजी अखबार अपने साथ लाने और बिहार में जबरदस्त चुनौती देने की तैयारी में है, तो जागरण की नजर भी कोलकाता स्थित एक अंग्रेजी अखबार पर है. उसकी बातचीत ओडिया, गुजराती के साथ-साथ उत्तर भारत के एक स्थापित हिंदी मीडिया समूह से भी चल रही बताई जाती है.

अगले पांच-छह माह में अधिग्रहण की कुछ तस्वीरें साफ होने की संभावना जताई जा रही है. सिर्फ अधिग्रहण ही नहीं, मीडिया समूह अपने ढांचे को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और सालाना बैठक करते रहते हैं. जागरण ने मार्केटिंग से जुड़े लोगों को कुशल बनाने के लिए कैलेंडर बना रखा है, तो भास्कर ने ग्लोबल कंपनी डेल कार्नेगी को अपने साथ जोड़ा है.

मीडिया समूहों में भले महाभारत छिड़ा हो, लेकिन आइआरएस 2011 की चौथी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि पिछली तिमाही के मुकाबले दैनिक जागरण ने 48,000, दैनिक भास्कर ने 2.74 लाख, राजस्थान पत्रिका ने 71,000 पाठक खोए हैं. जबकि राजस्थान से बाहर पत्रिका के नाम से कदम बढ़ा रहे समूह ने 25 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है. नईदुनिया ने भी चौथी तिमाही में वृद्धि की है, लेकिन उसे 10वें स्थान पर खिसकना पड़ा है. कुल मिलाकर हिंदी मीडिया में भारी उथल-पुथल का दौर है. प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर समूह अपना दायरा बड़ा दिखाना चाहता है, ताकि बाजार में उसका एकछत्र राज कायम हो सके.

साभार : इंडिया टुडे 
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बड़े परदे पर अब नहीं दिखता बिहार...

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विनोद अनुपम

‘अपहरण’ बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी शायद आखिरी फिल्म थी। जिसमें कहने को तो अहिंसा और हिंसा के द्वंद भी थे, यथार्थ और आदर्श का संघर्ष भी था। लेकिन मूल रूप से फिल्म नीतीश पूर्व के बिहार के आपराधिक वातावरण को चित्रित करती थी, जब राजनीति सीधे-सीधे अपराधियों द्वारा नियंत्रित की जा रही थी। जब जेल अपराधियों की ऐशगाह थी, जब अपहरण सबसे सुरक्षित धंधा समझा जाता था। बिहार को करीब से जानने वाले प्रकाश झा ने ‘अपहरण’ में बिहार को कुछ इस तरह चित्रित किया था कि फिल्म के मुख्य पात्रों में कुछ विख्यात-कुख्यात लोगों की पहचान सहजता से की जा सकती थी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना में आयोजित फिल्म के प्रीमियर शो में स्वयं उपस्थित होकर बिहार की इस प्रस्तुति की हौसला अफजाई की। फिल्म दर्शकों द्वारा पसंद भी की गई, बिहार ही नहीं देश में भी, विदेशों में भी। बावजूद इसके बिहार को प्रदर्शित करने वाली यह आखिरी फिल्म ही रही, आने वाले दिनों में किसी भी फिल्मकार ने बिहार की पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाने की तो हिम्मत नहीं ही जुटाई, बिहारी पात्रों की भी उपस्थिति हिंदी सिनेमा से अचानक गायब हो गई, जो 2005 के पहले तक हिंदी सिनेमा में आम थी। चाहे वह ‘जोश’ जैसी बड़ी फिल्म हो या ‘भोला इन बॉलीवुड’ जैसी छोटी फिल्म।


गौरतलब है कि यह ऐसा बिहार था, जिसमें न तो कोई स्वाभिमान था, न आत्मविश्वास। वास्तव में बिहार का यह दिखना फिल्मकारों का बिहार के प्रति कोई सौहार्द नहीं, सिनेमा के बाजार में बिहार का बढ़ता दबदबा था। यह ऐसे बिहारियों का दबदबा था जो अपनी मजबूरियों में बिहार से बाहर निकलने को मजबूर थे। जिस तरह ए ग्रेड फिल्मों के लिए ओवरसीज का मार्केट बढ़ा। उसी तरह बी और सी ग्रेड की फिल्मों के लिए बिहार और प्रवासी बिहारी नए टकसाल बने। उस दौर की अधिकांश फिल्मों में बिहारियों को तिकड़मी और अपराधी के रूप में चित्रित कर घृणा का पात्र बनाया जाता रहा, या फिर मूर्ख गंवार के रूप में हंसी का। 

अपराध के पर्याय के रूप में बिहार के चित्रण का अवसर बिहारी कलाकारों ने भी नहीं गंवाया। मनोज वाजपेयी की पहल पर ‘शूल’ का निर्माण हुआ। तकनीकी रूप से श्रेष्ठ बनी ‘शूल’ में दर्शाया गया था कि बिहार में एक स्थान है मोतीहारी, जहां एक अपराधी बच्चू यादव का अखंड राज चलता है। क्या वाकई कभी यह सच्चाई थी? ‘नरसिम्हा’ के बापजी या ‘प्रतिघात’ के कालीचरण का साम्राज्य तो बच्चू यादव से अधिक भयावह और प्रभावी था। लेकिन वहां फिल्मकार किसी भी स्थान और राज्य का नाम स्पष्ट करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे। लेकिन यहां मोतीहारी का नाम लेने में न किसी को कोई संकोच था, न डर। वह भी तब जब इस मोतीहारी से बापू का नाम जुड़ा था। ‘दामुल’, ‘मृत्युदण्ड’ और ‘गंगाजल’ में प्रकाश झा ने भी बिहार की आपराधिक स्थिति का खुले हाथों से चित्रण किया है, लेकिन बाकी फिल्मकारों के साथ उनकी प्रस्तुति में एक साफ 
फर्क महसूस किया जा सकता है। उनकी फिल्में सिर्फ आपराधिक चित्रण नहीं करतीं, एक राजनीतिक हस्तक्षेप जाहिर करती हैं। 

‘दामुल’ में आजादी के बाद सामंती शक्तियों का जनतांत्रिक प्रक्रिया के अपने हित में इस्तेमाल का चित्रण था तो ‘मृत्युदण्ड’ में ठेकेदारी से पनप रहे नवधनाढ्य वर्ग की सामंती प्रवृत्ति और आधुनिकता एवं रूढ़ियों के बीच पिसती महिलाओं की स्थिति पर विमर्श की गुंजाइश थी। ‘गंगाजल’ का कथानक अपराधियों के वर्चस्व, पुलिस के तत्काल निर्णय की शैली, जनता के आक्रोश और सामान्य न्यायिक प्रणाली पर एक सशक्त बहस खड़ी करती थी। आज यही प्रकाश झा जब ‘राजनीति’ बनाते हैं तो उनके पात्र बोलने के बिहारी लहजे को ही नहीं छोड़ते, पूरे बिहारी परिदृश्य से वे परहेज करते हैं। ‘आरक्षण’ में हिंदी प्रदेश दिखता है लेकिन उसमें बिहार या किसी बिहारी को ढूंढ निकालना संभव नहीं होता। 

अद्भुत है हिंदी सिनेमा की यह बिहार से बेरूखी। यदि बिहार मजाक उड़ाए जाने लायक है तो ठीक है, यदि बिहार के ‘जंगल राज’ को दिखाना है तो ठीक है, यदि बिहार की अमानवीयता दिखानी है तो ठीक है। यदि ये दिखाने की स्थिति नहीं बन रही है तो बिहार को दिखाने की जरूरत ही क्या है? बगैर किसी राजनीतिक निहितार्थ के यह कहने में शायद ही किसी को संकोच हो कि नीतीश कुमार के सामाजिक आर्थिक परिवर्तन की शुरुआत का बिहार पर चाहे जो भी प्रभाव पड़ा हो, यह प्रभाव तो निश्चित रूप से पड़ा कि बिहार अपने स्वाभिमान के प्रति जागृत हुआ है। बिहार में एक आत्मविश्वास की लहर देखी जा सकती है। राज्य ही नहीं, राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में भी बिहार और बिहारियों की उपलब्धियां हेडलाइन बन रही हैं। एक ओर जहां आईआईटी से लेकर सिविल सेवाओं, अमेरिका से लेकर दुबई तक में बिहार की सकारात्मक उपस्थिति दिख रही है, वहां उसे मूर्ख और हत्यारे के रूप में दिखाना कैसे युक्ति संगत हो सकता है। हालांकि इसका विकल्प आज से तीस वर्ष पहले शैलेंद्र ने फिल्मकारों को ‘तीसरी कसम’ बनाकर सुझाया था। 

फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित इस कहानी के फिल्मांकन में बासु भट्टाचार्य ने बिहार की लोकसंस्कृति के तमाम रंग समेटने की कोशिश की थी। लोक गाथाएं भी थीं इसमें, लोक गीत भी और नौटंकी भी। बिहारी गांव समाज तो थे ही। कमोबेश कुछ उसी तरह जैसे आज करण जौहर या यश चोपड़ा आम तौर पर पंजाब को परदे पर दिखाते हैं। उन्हीं की कोशिशों का नतीजा है कि आज सिनेमा में पंजाब का पर्याय है प्रेम, उत्साह, रंग, नृत्य, परिवार..। झारखंड से गए इम्तियाज अली, प्रकाश झा भी बिहार की हिंसा पर तो कथानक तैयार कर लेते हैं, लेकिन बिहार की सरलता, सामाजिकता, स्वाभाविकता उन्हें कहानी की कोई जमीन नहीं दे पाता। प्रवीण कुमार वृतचित्र बनाते हैं तो नैना जोगिन, मिथिला पेंटिंग पर। और फीचर फिल्म बनानी होती है तो बनाते हैं जो डूबा सो पार, लव इन बिहार। जिसमें नहीं दिखता है तो सिर्फ प्रेम। सवाल है जब बिहार के फिल्मकार बिहार में प्रेम का विषय नहीं खोज निकाल सकते, तो कोई क्यों इस क्षेत्र की चिंता करेगा जहां से उसे सबसे कम कलेक्शन मिल रहा हो।

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कॉरपोरेट कंपनियों के पे रोल पर खड़ा है भारतीय मीडिया!

[ Thursday 24 May 2012 | 0 आपकी राय ]

रामचंद्र गुहा 


























सन 1985 के आसपास की बात है। मैं कोलकाता के चितरंजन एवेन्यु के पास चुंगवा रेस्टोरेंट में दो दोस्तों के साथ खाना खा रहा था। हम लोग 70 के दशक में दिल्ली में साथ-साथ पढ़े थे और अब अपनी पहली नौकरियों में थे। मैं पढ़ा रहा था, बाकी दोनों पत्रकार बन गये थे। एक पत्रकार मित्र ने बताया कि वह एक बड़े औद्योगिक घराने के शहर के बाहर बने कारखाने से हो रहे प्रदूषण पर खबर करना चाहता है। दूसरे मित्र ने पूछा कि क्या यह ठीक होगा? तुम्हारी पत्रिका और मेरा अखबार, दोनों ही ऐसी कंपनियों के विज्ञापनों पर चलते हैं। ऐसे में उस कंपनी और अपने संपादक को नाराज करने से क्या फायदा?
मुझे वह बातचीत फिर याद आयी, जब मैं दिल्ली की एक समाचार पत्रिका की मुख्य खबर को पढ़ रहा था, जो प्रेस की आजादी के बारे में थी। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर लिखा था कि मीडिया पर चारों ओर से आक्रमण हो रहे हैं और इससे इमरजेंसी के काले दिन याद आते हैं। यह अतिशयोक्ति स्वाभाविक है, काफी लोग सरकार के किसी भी दमनकारी कानून में इमरजेंसी की झलक देख लेते हैं। पत्रिका की मुख्य खबर एक विधेयक के बारे में थी, जिसे कांग्रेस सांसद मीनाक्षी नटराजन लोकसभा में पेश करना चाहती थी। वह विधेयक अगर पारित हो जाता, तो उससे सरकार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की कवरेज को रोकने की असीमित शक्ति मिल जाती। पाबंदी का विरोध करने वाले अखबारों पर भारी जुर्माना लगाने और उनके लाइसेंस रद्द करने का भी प्रावधान इस बिल में था। सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने के दूसरे प्रयासों का भी जिक्र किया गया था।
सरकार खबरों का स्वतंत्र प्रसारण रोकने की कई तरह से कोशिश करती है। अंग्रेजों के जमाने के पुराने कानून उसे उन किताबों, पत्रिकाओं यहां तक की नक्शों पर पाबंदी लगाने का अधिकार देते हैं, जिनसे कोई सरकारी व्यक्ति असहमत हो। सरकार का यही रवैया खबरें सुनाने वाले निजी रेडियो स्टेशनों के बारे में भी है। कम्युनिटी रेडियो सहभागिता और सशक्तीकरण पर आधारित मीडिया है, जिसने नेपाल सहित कई देशों में लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को मजबूत किया है। यह भारत में मुमकिन नहीं है, क्योंकि यहां ऐसा रेडियो नहीं चल सकता, जो झारखंड में किसी ग्राम पंचायत द्वारा चलाया जा रहा हो और जिसमें नरेगा के भ्रष्टाचार पर कोई रिपोर्ट हो।
सरकार मीडिया पर लगाम कसने के ज्यादा सीधे तरीके भी अपनाती है। ममता बनर्जी ऐसी पहली और आखिरी मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन्होंने उन अखबारों को विज्ञापन देना बंद कर दिया, जो सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं। राज्य व केंद्र में कई मंत्री अपने विभाग के विज्ञापनों के मामले में पक्षपात करते दिखते हैं। कुछ इससे भी आगे बढ़कर पार्टी के गुंडों को उन रिपोर्टरों की मरम्मत करने भेज देते हैं, जो उनके या सरकार के खिलाफ खबर छापते हैं।
उस पत्रिका की यह खबर निश्चय ही बहुत अच्छी थी, लेकिन मुझे यह तथ्य दिलचस्प लगा कि सात या आठ पन्नों में सिर्फ एक पैराग्राफ ऐसा था, जिसमें आज के भारत में बड़े व ताकतवर औद्योगिक घरानों का जिक्र था, जो स्वतंत्र सूचना को उतना ही रोकते हैं, जितनी की सरकारें। इसका उदाहरण पेड न्यूज है।
पत्र-पत्रिकाएं कंपनियों के दिए हुए प्रचार के पर्चे इस तरह छापते हैं, जैसे वे निष्पक्ष खबरें हों। कई अखबारों ने तो बड़ी कंपनियों के साथ सुविधाजनक खबरों के बदले कंपनी के शेयर हासिल करने के समझौते किये हैं। पेड न्यूज तो एक सीधा, बल्कि खुला मीडिया भ्रष्टाचार है। निजी कंपनियां खबरों को बहुत महीन तरीके से भी तोड़ती-मरोड़ती हैं। 80 के दशक में चिपको और नर्मदा बचाओ आंदोलन काफी लोकप्रिय हुए थे, तब पर्यावरण के मुद्दों पर मीडिया कवरेज की बाढ़ आ गयी थी। अनिल अग्रवाल, कल्पना शर्मा, उषा राय, डेरिल डिमोंटे जैसे प्रतिभाशाली पत्रकारों ने पर्यावरण और उसके सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर बहुत लिखा।
90 के दशक में उदारीकरण के बाद कई अखबारों ने शायद विज्ञापनदाताओं के दबाव में पर्यावरण रिपोर्टिंग काफी कम कर दी। दिल्ली का एक अखबार, जो पहले अपनी जमीनी रिपोर्टिंग और स्वतंत्र विचारों के लिए जाना जाता था, वह भारतीय उद्योग-व्यापार जगत का अनौपचारिक प्रवक्ता बन गया। मंत्रियों की तरह ही व्यापारी भी अखबारों या चैनलों से अपने विज्ञापन हटा लेते हैं, जो उनकी आलोचना करते हैं। बस वे बिना धमकी दिये चुपचाप ऐसा करते हैं।
नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने में प्रेस बड़े व छोटे उद्योगों के प्रति अतिरिक्त आक्रामक था। उद्योगपतियों को तब लालची, मुनाफाखोर जीव की तरह देखा जाता था, जो समाजवादी भारत का सपना तोड़ रहे थे। अब पेंडुलम दूसरे छोर पर पहुंच गया है। खासतौर पर अंग्रेजी मीडिया का रुख उद्योगपतियों के प्रति सम्मान, बल्कि पूजाभाव का रहता है। यह पूजाभाव उद्योगपति की दौलत के अनुपात में बढ़ता चला जाता है। टेलीविजन एंकर्स वरिष्ठ मंत्रियों और बड़े विपक्षी नेताओं से तल्खी से, बल्कि अक्सर अतिरिक्त आक्रामकता से सवाल पूछते हैं, लेकिन बड़े उद्योगपतियों से विनम्रता बरतते हैं और कभी भी मुश्किल सवाल नहीं पूछते।
मैं इस साल जनवरी से मार्च तक देश के बाहर था। इस बीच मैं गूगल न्यूज के जरिये भारत की खबरों से जुड़ा रहता था। लेकिन जब मैं लौटकर आया, तब मुझे पता चला कि भारत के सबसे धनवान व्यक्ति की कंपनी ने एक प्रभावशाली मीडिया हाउस में हिस्सेदारी खरीद ली है। इस पर गंभीरता से बहस होनी चाहिए थी कि इसका प्रेस की स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा? लेकिन अगर ऐसा हुआ भी हो, तो मेरी नजर में नहीं आया।
मेरा शक तब गहराया, जब कई पत्रिकाओं ने भारत के सबसे अमीर आदमी की पत्नी के बारे में चाटुकारिता भरी खबरें छापीं, जिनमें उसे सुंदरता, करुणा और विवेक का प्रतीक बताया गया, जिसमें मदर टेरेसा, अमर्त्य सेन और राजकुमारी डायना के गुणों का समन्वय हो। इनमें से एक लेख तो उसी पत्रिका के उसी अंक में छपा था, जिसमें मीनाक्षी नटराजन के बिल की तुलना इमरजेंसी में विद्याचरण शुक्ल और संजय गांधी से की गयी थी।
अब भी मीडिया में कई स्वतंत्र व निष्पक्ष आवाजें हैं, जो सरकार या धन की परवाह नहीं करतीं। जिस पत्रकार मित्र ने 1985 में रासायनिक प्रदूषण पर खबर करनी चाही थी, वह आज भी ईमानदारी से अपने पेशे में जुटा हुआ है। उसके ताजा कामों में पेड न्यूज पर प्रेस कौंसिल के लिए एक रिपोर्ट और कर्नाटक के खदान माफिया पर एक फिल्म शामिल है। जिस दूसरे पत्रकार मित्र ने विज्ञापनदाताओं का ख्याल रखने की सलाह दी थी, उसका क्या हुआ? वह समझदार युवा पत्रकार अब प्रौढ़ आयु में भारतीय जनता पार्टी का राज्यसभा सांसद है।

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वर्तिका नन्दा »

हिंदुस्तानी राष्ट्रपति और एकपक्षीय रिपोर्टिग की मिसाल

[ Thursday 17 May 2012 | 0 आपकी राय ]

वर्तिका नन्दा

राष्ट्रपति के तौर पर अपनी अंतिम विदेश यात्रा से लौटते हुए विमान में देश की प्रथम नागरिक ने इस बात को साफ किया कि उनकी विदेश यात्रा को सरकार तय किया करती है, न कि राष्ट्रपति भवन। उन्होंने यह भी कहा कि वे पहली या अंतिम राष्ट्रपति नहीं हैं, जिनके साथ उनका परिवार यात्रा पर गया हो। इससे दुखद और क्या होगा कि किसी देश की प्रथम महिला को ऐसे विवादों और सवालों का जवाब देना पड़े जो उनके कार्यकाल से पहले या उसके बाद भी उपज सकते थे। कार्यकाल का अंतिम समय, जो कि सुखद और भावुक क्षण होना चाहिए या फिर उपलब्धियों पर गरिमामय उल्लास का भी, वहां बेवजह के सवालों के जवाब देने की मजबूरी दिखे, उसका क्या औचित्य है?

देश का अगला राष्ट्रपति कौन हो -इसकी तमाम चिंताओं के बीच दरअसल इस समय एक नई राजनीति मौजूदा राष्ट्रपति की काबिलियत को लेकर शुरू हो गई है। दलित राष्ट्रपति, मुस्लिम राष्ट्रपति, सिख राष्ट्रपति, महिला राष्ट्रपति के बाद इस बार क्या हो, इस पर बहस का बाजार गर्म है। नए आगमन को लेकर चर्चाएं हैं पर जिनकी विदाई है, वे इससे कहीं ज्यादा चर्चा और विवाद का केंद्र बना दी गई हैं। तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। 

जुलाई 2007 में मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विशेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें। यह बार-बार याद दिलाया गया कि वे आज तक कभी कोई चुनाव नहीं हारीं हैं और बेहद प्रतिभावान हैं। उनके साथ उम्मीदों की एक भारी पोटली बांध दी गई। उनके जेहन में भी महिला सशक्तिकरण और मजबूत भारत का सपना हमेशा रहा और उसे निभाने में यह पांच साल पंख लगाकर उड़ भी गए। अब लगा था कि यह समय उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापन का होगा।

पर अब एक नई तस्वीर उभर रही है। यहां विवाद हैं। क्या वे वाकई राष्ट्रपति के तौर पर इस देश के लिए कुछ कर पाईं, उनकी यात्राओं पर 205 करोड़ रुपए का खर्च क्यों और कैसे हुआ, उनके परिवार ने उनके पद का कितना दुरूपयोग किया आदि। सवालों की झड़ी लंबी है। इन सवालों पर सोचने की जरूरत भी महसूस की जा सकती है पर साथ ही यह भी लगता है कि यह तमाम सवाल एक गलत समय पर उठे हैं और इसलिए इनका औचित्य भी कमजोर दिखाई देता है। क्योंकि इन्हें शायद किसी विमर्श के लिए उठाया ही नहीं गया है। यह सब सवाल न तो चिंता की वजह से उठाए गए हैं और न ही किसी तरह के चिंतन के लिए। यह सवाल सिर्फ सवालों की भीड़ को खड़ा करने के लिए उठाए गए हैं। वैसे भी अगर वे एक रबर स्टांप राष्ट्रपति थीं तो फिर ज्ञानी जैल सिंह या फखरुद्दीन अली अहमद क्या थे। तमाम राष्ट्रपति किसी न किसी स्तर पर रबर स्टांप रहे पर उन्हें लेकर इस तरह की तीखी टिप्पणियां नहीं हुईं।

दूसरे, बाकी बहुत से नेताओं या शीर्षस्थ पदाधिकारियों के मुकाबले प्रतिभा पाटिल ने यहां भी समझदारी ही दिखाई। वे उलझी नहीं। पुणो की जमीन को लेकर विवाद हुआ तो उन्होंने उसे लौटा ही दिया लेकिन उनके इस कदम पर कोई प्रशंसात्मक खबर नहीं बनी। इसके अलावा उनके विद्या भारती शिक्षण प्रसारक मंडल पर कभी विस्तार से चर्चा नहीं की गई। इस बार वजह साफ समझ में आती है। जिस वजह से प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति के पद के लिए चुना गया, वही उनका विरोधी भी साबित हुआ है।  उनका महिला होना, सौम्य होना और चुप्पी साधे रखना। अगर ऐसा न होता तो नरेगा और महिला सशक्तिकरण को लेकर राष्ट्रपति जिस तरह लगातार सक्रिय और चिंतित रहीं, उन पर इस समय शायद कसीदे गढ़े जाते। पर चीजें बदलती हैं। कई बार विदाई को आभार की बजाए नकारात्मक तरीके से अंजाम दिया जाता है। इस बार भी यही हुआ है। यह गैर-जिम्मेदाराना, एकपक्षीय रिपोर्टिग की एक ऐसी मिसाल है जिसे सालों याद किया जाएगा।
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आशीष महर्षि
Delhi, Delhi, India
एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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